बाबा गोरखनाथ का नाम सुनते ही मन में एक ऐसे सिद्ध योगी की छवि उभरती है, जिन्होंने भारतीय अध्यात्म और योग परंपरा को एक नई दिशा दी। क्या आप जानते हैं कि आज हम जो ‘हठयोग’ (Hatha Yoga) करते हैं, उसकी नींव रखने वाले मुख्य गुरु बाबा गोरखनाथ ही थे?
नमस्ते दोस्तों! आज हम इतिहास के पन्नों को पलटेंगे और उस महायोगी के बारे में जानेंगे जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। चलिए, इस आध्यात्मिक यात्रा पर साथ चलते हैं।
बाबा गोरखनाथ का जन्म और पौराणिक कथाएं
बाबा गोरखनाथ के जन्म को लेकर कई मतभेद और रोचक कथाएं प्रचलित हैं। सबसे प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, जब आदिनाथ (भगवान शिव) ने माता पार्वती को अमरकथा सुनाई थी, तब मत्स्येंद्रनाथ जी ने उसे सुन लिया था। बाद में मत्स्येंद्रनाथ जी (Matsyendranath) एक भिक्षा मांगते समय एक निःसंतान महिला से मिले।
उन्होंने उस महिला को एक ‘भभूत’ (Sacred Ash) दी और कहा कि इसे खा लेने से उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। लेकिन महिला ने डर के मारे उस भभूत को गोबर के ढेर में फेंक दिया। 12 साल बाद जब मत्स्येंद्रनाथ वापस आए, तो उन्होंने उस जगह पर पुकारा। तब उस गोबर के ढेर से एक तेजस्वी बालक निकला, जिसे ‘गोरखनाथ’ कहा गया।
बाबा गोरखनाथ के नाम का रहस्य: क्यों पड़ा उनका नाम ‘गोरखनाथ’?
बाबा गोरखनाथ का नाम केवल एक पहचान नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य (Spiritual Mystery) है। उनके नाम के हर अक्षर में योग, प्रकृति और ब्रह्मांड का ज्ञान छिपा है। क्या आपने कभी सोचा है कि ‘गोरख’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है? यह नाम उन्हें उनके गुरु ने दिया था या इसके पीछे कोई दैवीय संकेत था?

नमस्ते! आज के इस विशेष लेख में हम बाबा गोरखनाथ के नाम के पीछे छिपे भाषाई (Linguistic) और आध्यात्मिक (Spiritual) रहस्यों को उजागर करेंगे। चलिए जानते हैं कि कैसे एक बालक का नाम ‘गोरख’ पड़ा और वह ‘नाथों के नाथ’ बन गए।
‘गोरख’ शब्द की उत्पत्ति और अर्थ (Etymology)
‘गोरख’ शब्द मुख्य रूप से दो शब्दों के मेल से बना माना जाता है: ‘गो’ (Go) और ‘रख’ (Rakh)। संस्कृत और योग ग्रंथों में इसके कई गहरे अर्थ बताए गए हैं:
1. इंद्रियों के रक्षक (Protector of Senses)
संस्कृत में ‘गो’ का अर्थ होता है ‘इंद्रियाँ’ (Senses) और ‘रख’ का अर्थ होता है ‘रक्षक’ या ‘पालक’।
- रहस्य: जिसने अपनी दसों इंद्रियों (आंख, कान, नाक आदि) को जीत लिया हो और उन्हें बाहरी विकारों से सुरक्षित रखा हो, वही ‘गोरख’ है। यह नाम उनकी इंद्रिय-विजय (Self-Mastery) का प्रतीक है।
2. पृथ्वी और ज्ञान के रक्षक
‘गो’ का एक अर्थ ‘पृथ्वी’ (Earth) और ‘ज्ञान’ (Knowledge) भी होता है।
- रहस्य: बाबा गोरखनाथ ने पृथ्वी पर लुप्त हो रहे योग ज्ञान की रक्षा की और उसे जन-साधारण तक पहुँचाया, इसलिए उन्हें ‘गोरख’ कहा गया। [Internal/External Link Here]
पौराणिक कथा: गोबर के ढेर से ‘गोरख’ तक
जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, बाबा गोरखनाथ का जन्म किसी गर्भ से नहीं, बल्कि गुरु मत्स्येंद्रनाथ द्वारा दी गई ‘सिद्ध भभूत’ से हुआ था।
- कथा का मोड़: जब बालक 12 वर्ष बाद गोबर के ढेर से प्रकट हुआ, तब गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने उसे ‘गो-रख’ नाम दिया।
- तर्क: ‘गो’ का अर्थ गाय का गोबर (Cow Dung) भी होता है और ‘रख’ का अर्थ ‘रक्षित’ (Protected)। चूंकि वह बालक गोबर के ढेर के भीतर सुरक्षित (Protected inside the mound) रहा था, इसलिए गुरु ने उनका नाम ‘गोरखनाथ’ रखा।

‘नाथ’ शब्द का महत्व (The Meaning of ‘Nath’)
बाबा गोरखनाथ के नाम के पीछे जुड़ा ‘नाथ’ शब्द उनके संप्रदाय की सर्वोच्च पदवी है।
- स्वामी और रक्षक: ‘नाथ’ का अर्थ होता है स्वामी (Master) या वह जो रक्षा करता है।
- शिव स्वरूप: नाथ संप्रदाय में ‘आदिनाथ’ साक्षात शिव को कहा जाता है। चूंकि गोरखनाथ शिव के ही अवतार माने गए, इसलिए उनके नाम के पीछे ‘नाथ’ जुड़ गया, जिसका अर्थ है— “वह जो अपनी आत्मा का स्वामी है।”
नाम का दार्शनिक रहस्य (Philosophical Meaning)
नाथ साहित्य (Nath Literature) के अनुसार, ‘गोरख’ शब्द के अक्षरों का अपना एक विज्ञान है:
- ग (Ga): ज्ञान (Knowledge) का प्रतीक।
- र (Ra): रूप (Form) और प्रकाश का प्रतीक।
- ख (Kha): ख (आकाश/Space) या शून्यता का प्रतीक।
अर्थात, वह महायोगी जो ज्ञान के प्रकाश से शून्य (Paramatman) में विलीन हो गया हो, वही गोरख है।
क्या ‘गोरखा’ शब्द भी इसी से आया है?
जी हाँ! नेपाल के वीर ‘गोरखा’ (Gorkha) सैनिकों का नाम भी बाबा गोरखनाथ के नाम से ही प्रेरित है। माना जाता है कि बाबा ने उन्हें अपनी रक्षा का आशीर्वाद दिया था, जिसके बाद वे ‘गोरख-रक्षक’ या ‘गोरखा’ कहलाए। आज भी गोरखा रेजिमेंट के युद्ध घोष (War Cry) में बाबा का स्मरण किया जाता है।
बाबा गोरखनाथ के प्रसिद्ध मंत्र: कब, कहाँ और कैसे करें साधना?

बाबा गोरखनाथ की साधना को तंत्र और योग की दुनिया में सबसे प्रभावशाली माना जाता है। उनके मंत्र न केवल नकारात्मकता को दूर करते हैं, बल्कि व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति का संचार भी करते हैं। लेकिन, इन शाबर मंत्रों (Shabar Mantras) और सिद्ध मंत्रों का उपयोग करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
बाबा गोरखनाथ के सबसे प्रभावशाली मंत्र
बाबा गोरखनाथ के मंत्रों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है: वैदिक/सिद्ध मंत्र और शाबर मंत्र।
1. सिद्ध शाबर मंत्र (सबसे शक्तिशाली)
“चेत मछेन्द्र गोरख आया।”
यह मंत्र मात्र एक वाक्य नहीं, बल्कि एक चेतना है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब व्यक्ति को लगे कि उसके जीवन में आलस्य या नकारात्मक ऊर्जा बढ़ गई है।
2. गुरु गोरखनाथ गायत्री मंत्र
“ॐ विद्महे शिव गोरक्षाय धीमहि तन्नो गोरख प्रचोदयात्।”
यह मंत्र बुद्धि की शुद्धि और आध्यात्मिक जागृति के लिए अचूक है। [Internal/External Link Here]
3. सुरक्षा मंत्र
“ॐ शिव गोरक्ष योगी नमः”
यह सबसे सरल और प्रभावी मंत्र है जिसे कोई भी आम व्यक्ति अपनी सुरक्षा और शांति के लिए जप सकता है।
मंत्र साधना क्यों करें? (The ‘Why’)
बाबा गोरखनाथ के मंत्रों का जाप केवल धार्मिक कारण से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और शारीरिक लाभ के लिए भी किया जाता है:
- भय का नाश: यदि आपको अनजाना डर या बुरे सपने आते हैं, तो ये मंत्र कवच की तरह काम करते हैं।
- इच्छाशक्ति (Willpower): योगियों के अनुसार, इन मंत्रों की ध्वनि तरंगें सीधे ‘मणिपुर चक्र’ पर प्रहार करती हैं, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है।
- नकारात्मक ऊर्जा से बचाव: तंत्र बाधा या बुरी नजर को काटने में नाथ पंथी मंत्रों का कोई सानी नहीं है।
मंत्र कब और कहाँ जपें? (The ‘When’ and ‘Where’)
साधना की सफलता स्थान और समय के सही चुनाव पर निर्भर करती है:
सही समय (The Timing):
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:00 से 6:00 बजे का समय सर्वश्रेष्ठ है।
- संध्या काल: सूर्यास्त के समय जब दिन और रात मिल रहे हों।
- विशेष तिथियां: मकर संक्रांति, गुरु पूर्णिमा, या किसी भी महीने का शुक्ल पक्ष का मंगलवार और रविवार।
सही स्थान (The Location):
- शांत कोना: घर का कोई ऐसा कोना जहाँ शोर न हो।
- सिद्ध स्थान: यदि संभव हो तो किसी पुराने शिव मंदिर या नाथ मठ में बैठकर किया गया जप हजार गुना फल देता है।
- धुनी के पास: नाथ संप्रदाय में जलती हुई धुनी (Sacred Fire) के सामने बैठकर मंत्र पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है।
मंत्र कैसे लिखें और जपें? (The Method)
मंत्रों को लिखने और जपने की विधि बहुत सूक्ष्म होती है। इसमें ‘भाव’ सबसे ऊपर है।
मंत्र लिखने की विधि:
यदि आप मंत्र सिद्ध करना चाहते हैं, तो इसे भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से लिखें। अगर सामान्य अभ्यास कर रहे हैं, तो सफेद कागज पर लाल कलम से 108 बार लिखें। लिखते समय मौन रहें और केवल मंत्र के अर्थ पर ध्यान दें।
जपने की सही विधि:
- आसन: कुश का आसन या ऊनी कंबल का आसन इस्तेमाल करें।
- दिशा: आपका मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए।
- माला: रुद्राक्ष की माला का ही उपयोग करें।
- प्रक्रिया: सबसे पहले अपने गुरु और फिर मत्स्येंद्रनाथ जी का ध्यान करें। इसके बाद बाबा गोरखनाथ का आह्वान करें और जप शुरू करें।
सावधानी और नियम
बाबा गोरखनाथ ‘कठोर’ गुरु माने जाते हैं। उनकी साधना में शुचिता (Purity) का बहुत महत्व है:
- साधना के दौरान मांस-मदिरा का पूरी तरह त्याग करें।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- झूठ बोलने और क्रोध करने से बचें।
बाबा गोरखनाथ की प्रसिद्ध कहानियाँ: चमत्कार, लोक-कल्याण और ज्ञान के अद्भुत किस्से
बाबा गोरखनाथ के बारे में प्रचलित कहानियाँ केवल चमत्कार नहीं, बल्कि जीवन के गहरे पाठ हैं। वे एक ऐसे सिद्ध पुरुष थे जो कभी राजाओं के अहंकार को तोड़ते थे, तो कभी साधारण गरीब की भक्ति पर अपना सब कुछ न्योछावर कर देते थे।

1. जब गोरखनाथ ने भगवान इंद्र का अहंकार तोड़ा
एक बार पूरे देश में भयंकर सूखा पड़ा। कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिससे चारों ओर हाहाकार मच गया। लोक कथाओं के अनुसार, बाबा गोरखनाथ को पता चला कि इंद्र देव (Indra Dev) ने अपनी शक्ति के घमंड में बादलों को बांध दिया है।
बाबा गोरखनाथ ने एक विशेष योग साधना शुरू की। उन्होंने ‘नौ नागों’ (Nine Cobras) को अपने आसन के नीचे दबा लिया और समाधि में बैठ गए। चूंकि नाग वर्षा के कारक माने जाते थे, इंद्र परेशान हो गए। अंततः, इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्हें वर्षा करनी पड़ी। यह कहानी हमें सिखाती है कि योग की शक्ति प्रकृति और देवताओं को भी प्रभावित कर सकती है।
2. राजा भरथरी और रानी पिंगला की कथा
बाबा गोरखनाथ की सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक राजा भरथरी (Raja Bharthari) के वैराग्य की है। भरथरी एक प्रतापी राजा थे, लेकिन वे अपनी पत्नी रानी पिंगला से अत्यधिक प्रेम करते थे।
एक बार बाबा गोरखनाथ ने भरथरी की परीक्षा लेने के लिए उन्हें एक ‘अमर फल’ दिया। राजा ने वह फल अपनी रानी को दे दिया। रानी ने वह फल अपने सेनापति को और सेनापति ने एक वैश्या को दे दिया। जब वह फल वापस घूमकर राजा के पास आया, तो उनका मोह टूट गया। वे बाबा गोरखनाथ के चरणों में गिर पड़े और राज-पाट त्याग कर ‘वैरागी’ बन गए।
3. माता ज्वाला देवी और अधूरी खिचड़ी की कहानी
हिमाचल प्रदेश के ज्वाला देवी मंदिर से जुड़ी एक बहुत ही रोचक कहानी है। कहा जाता है कि बाबा गोरखनाथ वहां तपस्या कर रहे थे। माता ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। बाबा गोरखनाथ ने कहा, “माता, आप पानी गर्म करें, मैं भिक्षा मांगकर चावल और दाल लेकर आता हूँ।”
बाबा गोरखनाथ वहां से चले गए और फिर कभी लौटकर नहीं आए। मान्यता है कि ज्वाला जी में जो ज्योति बिना तेल और बाती के जल रही है, वह आज भी पानी उबाल रही है और बाबा गोरखनाथ की प्रतीक्षा कर रही है। यही कारण है कि गोरखपुर के मंदिर में आज भी ‘खिचड़ी’ का विशेष महत्व है।
4. रानी मैनावती और गोपीचंद का त्याग
राजा गोपीचंद (Gopichand) अपनी युवावस्था और सुंदरता पर बहुत गर्व करते थे। उनकी माँ, मैनावती, जो स्वयं बाबा गोरखनाथ की शिष्या थीं, जानती थीं कि शरीर नश्वर है। उन्होंने अपने बेटे को बाबा गोरखनाथ के पास भेजा।
बाबा ने गोपीचंद को ऐसी शिक्षा दी कि उन्होंने अपने रेशमी वस्त्र त्याग कर भभूत मल ली। यह कहानी हमें संदेश देती है कि बाहरी सुंदरता कुछ नहीं है, असली सौंदर्य आत्मा की शुद्धि में है।
5. गोरखनाथ और कबीर दास का मिलन
कहा जाता है कि बाबा गोरखनाथ और संत कबीर (Sant Kabir) के बीच आध्यात्मिक संवाद हुआ था। यद्यपि दोनों के समय काल में अंतर बताया जाता है, लेकिन लोक कथाओं में उनके बीच ‘ज्ञान की चर्चा’ का वर्णन मिलता है। गोरखनाथ ने योग मार्ग पर जोर दिया, जबकि कबीर ने प्रेम और सहज मार्ग पर। इस मिलन की कहानियाँ भारतीय अध्यात्म के दो अलग-अलग रास्तों के सुंदर मिलन को दर्शाती हैं।
बाबा गोरखनाथ की प्रमुख पुस्तकें और उनका सार
बाबा गोरखनाथ की रचनाएं मुख्य रूप से संस्कृत और पुरानी हिंदी (गोरखबानी) में हैं। यहाँ उनकी कुछ सबसे प्रभावशाली पुस्तकों का विवरण दिया गया है:
1. सिद्ध सिद्धांत पद्धति (Siddha Siddhanta Paddhati)
यह बाबा गोरखनाथ की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है। इसमें ‘पिंड-ब्रह्मांड’ के सिद्धांत को समझाया गया है।
- क्या है इसमें? यह पुस्तक बताती है कि जो कुछ भी इस विशाल ब्रह्मांड (Universe) में है, वही सब कुछ मानव शरीर (Human Body) के भीतर भी है। इसमें शरीर के भीतर के 9 चक्रों, 16 आधारों और 5 व्योम (आकाश) का विस्तार से वर्णन है।
2. गोरक्ष संहिता (Goraksha Samhita)
यह हठयोग का एक प्रामाणिक ग्रंथ है। इसे योग की ‘गाइडबुक’ भी कहा जा सकता है।
- क्या है इसमें? इसमें प्राणायाम, आसन और कुंडलिनी जागरण की विधियां दी गई हैं। यह सिखाती है कि कैसे अपनी सांसों पर नियंत्रण पाकर हम मन को जीत सकते हैं और लंबी आयु प्राप्त कर सकते हैं। [Internal/External Link Here]
3. विवेक मार्तंड (Viveka Martanda)
यह ग्रंथ आत्म-ज्ञान और विवेक (Wisdom) पर आधारित है।
- क्या है इसमें? इसमें शरीर की नाड़ियों (Nadis) के शोधन और षटकर्म (सफाई की क्रियाएं) के बारे में बताया गया है। यह उन साधकों के लिए है जो संसार में रहते हुए भी विरक्त रहना चाहते हैं।
4. गोरखबानी (Gorakh Bani)
यह बाबा गोरखनाथ के पदों और सबदियों (दोहों) का संग्रह है, जिसे बाद में डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने संपादित किया।
- क्या है इसमें? यह बहुत ही सरल और कड़वी सच्चाई वाली भाषा में है। इसमें बाहरी आडंबरों (दिखावे) का विरोध किया गया है और मन के भीतर के ईश्वर को खोजने पर जोर दिया गया है। इसकी भाषा ‘सधुक्कड़ी’ है।

अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं
इनके अलावा भी कई ऐसी पुस्तकें हैं जो नाथ संप्रदाय के आधार स्तंभ हैं:
- अमनस्क योग: इसमें मन को शून्य करने की अवस्था (State of Thoughtlessness) का वर्णन है।
- योग बीज: योग साधना की शुरुआत कैसे करें, इसका बीज मंत्र यहाँ मिलता है।
- योग सिद्धांत पद्धति: योग के नियमों और अनुशासन पर आधारित पुस्तक।
इन पुस्तकों की मुख्य शिक्षाएं (Key Themes)
बाबा गोरखनाथ के साहित्य में कुछ बातें बार-बार उभर कर आती हैं, जो आज के Modern Psychology से भी मेल खाती हैं:
- काया साधना (Body Cultivation): उनका मानना था कि जब तक शरीर स्वस्थ और मजबूत नहीं होगा, तब तक मोक्ष प्राप्त करना असंभव है।
- शून्य की अवस्था: विचारों से मुक्ति ही असली आजादी है।
- अनुभव पर जोर: उन्होंने किताबी ज्ञान से ज्यादा ‘अनुभव’ (Experience) को महत्व दिया। वे कहते थे— “कथनी तज, करणी कर” (सिर्फ बोलो मत, करके दिखाओ)।
बाबा गोरखनाथ का साहित्य आज क्यों पढ़ें?
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम तनाव (Anxiety) और भटकाव के शिकार हैं। बाबा गोरखनाथ की पुस्तकें हमें ‘Focus’ और ‘Internal Balance’ सिखाती हैं। उनकी रचनाएं हमें बताती हैं कि हमारी हर समस्या का समाधान हमारे अपने शरीर और मन के भीतर ही छिपा है।
नाथ संप्रदाय और बाबा गोरखनाथ का योगदान
बाबा गोरखनाथ केवल एक संत नहीं थे, बल्कि वे नाथ संप्रदाय (Nath Sampradaya) के वास्तविक संस्थापक और संगठक माने जाते हैं। उन्होंने बिखरे हुए योगियों और साधुओं को एक सूत्र में पिरोया।
1. हठयोग के प्रवर्तक
आज दुनिया भर में योग प्रसिद्ध है, लेकिन बाबा गोरखनाथ ने ही इसे जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने ‘गोरक्ष संहिता’ और ‘सिद्ध सिद्धांत पद्धति’ जैसे ग्रंथों के माध्यम से शरीर और मन को साधने की तकनीक सिखाई।
2. सामाजिक समानता
उस दौर में जब समाज जाति-पाति के बंधनों में जकड़ा हुआ था, बाबा गोरखनाथ ने ‘अलख निरंजन’ का उद्घोष किया। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर की भक्ति पर हर किसी का समान अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो।
बाबा गोरखनाथ की चमत्कारिक शक्तियां और सिद्धियां
कहा जाता है कि बाबा गोरखनाथ के पास ऐसी सिद्धियां थीं कि वे समय और स्थान के बंधनों से परे थे। लोक कथाओं में जिक्र मिलता है कि वे अमर हैं और आज भी हिमालय की गुफाओं में सूक्ष्म रूप में विचरण करते हैं।
- काया कल्प: वे अपने शरीर को क्षण भर में बूढ़ा या जवान बना सकते थे।
- प्रकृति पर नियंत्रण: लोक कथाओं के अनुसार, उन्होंने कई बार सूखे क्षेत्रों में वर्षा करवाई और लोगों के कष्ट दूर किए।
गोरखनाथ मंदिर (गोरखपुर) का महत्व
उत्तर प्रदेश का गोरखपुर शहर बाबा गोरखनाथ के नाम पर ही बसा है। यहाँ का ‘गोरखनाथ मंदिर’ (Gorakhnath Temple) करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। खिचड़ी का मेला (Makar Sankranti) यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव है, जहाँ नेपाल से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं।
बाबा गोरखनाथ के अनमोल उपदेश (Teachings)
बाबा गोरखनाथ की शिक्षाएं आज के तनावपूर्ण जीवन (Stressful Life) में बहुत प्रासंगिक हैं:
- संयम: अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना ही असली जीत है।
- शून्यता: मन को विचारों से मुक्त करके ही आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
- गुरु का महत्व: बिना गुरु के ज्ञान और मोक्ष संभव नहीं है।
बाबा गोरखनाथ का जन्म कब हुआ? (The Timeline)
बाबा गोरखनाथ के जन्म की कोई एक निश्चित तारीख (Specific Date) इतिहास में दर्ज नहीं है। अलग-अलग विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर अलग-अलग समय बताया है:
1. ऐतिहासिक मत (Historical Views)
- राहुल सांकृत्यायन: प्रसिद्ध इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, गोरखनाथ का समय 9वीं शताब्दी (9th Century) के आसपास था।
- डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी: उन्होंने बाबा गोरखनाथ का समय 12वीं शताब्दी (12th Century) माना है। अधिकांश आधुनिक विद्वान इसी मत से सहमत हैं क्योंकि इस काल में नाथ पंथ का प्रभाव सबसे अधिक देखा गया।
- अन्य शोधकर्ता: कुछ लोग उन्हें 8वीं तो कुछ 11वीं शताब्दी का बताते हैं। [Internal/External Link Here]
2. पौराणिक और आध्यात्मिक मत
नाथ पंथ की मान्यताओं के अनुसार, बाबा गोरखनाथ किसी समय-सीमा (Timeframe) में नहीं बंधे हैं। वे सतयुग में पेशावर (पंजाब), त्रेतायुग में गोरखपुर, द्वापरयुग में द्वारका और कलियुग में गोरखपुर के गोरखमढ़ी स्थान पर प्रकट हुए थे। आध्यात्मिक दृष्टि से उन्हें ‘अयोनिज’ (बिना गर्भ के जन्म लेने वाला) माना जाता है, जो समय-समय पर समाज कल्याण के लिए प्रकट होते रहते हैं।
बाबा गोरखनाथ की मृत्यु कब और कैसे हुई? (The Mystery of Departure)
यहाँ सबसे बड़ा रहस्य आता है— बाबा गोरखनाथ की मृत्यु कभी नहीं हुई।
नाथ परंपरा और योग विज्ञान में ‘मृत्यु’ शब्द का प्रयोग सिद्ध योगियों के लिए नहीं किया जाता। इसके पीछे के प्रमुख कारण और कथाएं इस प्रकार हैं:
1. काया-सिद्धि और अमरता
बाबा गोरखनाथ ‘हठयोग’ के महानतम आचार्य थे। उन्होंने ‘काया-सिद्धि’ (Mastery over the physical body) प्राप्त कर ली थी। योगियों का मानना है कि उन्होंने अपने शरीर के तत्वों को इतना शुद्ध और शक्तिशाली बना लिया था कि काल (समय) उन पर प्रभाव नहीं डाल सका। इसलिए, उन्हें ‘अमर’ (Immortal) कहा जाता है।
2. समाधि लेना (Mahasamadhi)
इतिहास के कुछ पन्नों में जिक्र मिलता है कि बाबा गोरखनाथ ने अपनी इच्छा से ‘महा-समाधि’ ली थी। समाधि का अर्थ मृत्यु नहीं, बल्कि अपनी चेतना को ब्रह्मांड की परम चेतना में विलीन कर लेना है। वे आज भी सूक्ष्म रूप (Subtle Form) में हिमालय या गिरनार की पहाड़ियों में विचरण करते माने जाते हैं।
3. ‘लोप’ होना (Disappearance)
लोक कथाओं के अनुसार, बाबा गोरखनाथ कभी मरे नहीं, बल्कि वे ‘अदृश्य’ या ‘लोप’ हो गए। उन्होंने अपने शिष्यों को ज्ञान दिया और फिर अपनी योग शक्ति से अंतर्ध्यान हो गए। आज भी नाथ संप्रदाय के योगी मानते हैं कि बाबा किसी न किसी रूप में उनके साथ हैं।

मृत्यु पर विजय का मनोवैज्ञानिक पहलू
बाबा गोरखनाथ की ‘अमरता’ हमें एक बहुत बड़ा संदेश देती है। एक इंसान अपने शरीर से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और विचारों (Legacy) से जीवित रहता है। उन्होंने जो योग और ध्यान की पद्धतियां (Techniques) दीं, वे आज हजारों साल बाद भी जीवित हैं और लोगों का कल्याण कर रही हैं। यही एक महायोगी की असली अमरता है। [Internal/External Link Here]
क्या बाबा गोरखनाथ आज भी जीवित हैं?
यह एक ऐसा सवाल है जो हर जिज्ञासु के मन में आता है। योग मार्ग में ऐसी मान्यता है कि ‘सिद्ध’ पुरुष कभी मरते नहीं, वे केवल अपना चोला (Body) बदलते हैं। नाथ परंपरा के अनुयायियों का मानना है कि बाबा गोरखनाथ ‘चिरंजीवी’ हैं और वे आज भी योगियों का मार्गदर्शन करते हैं।
बाबा गोरखनाथ के प्रसिद्ध मंदिर: कहाँ हैं, क्या है उनकी शक्ति और कैसे करें पूजा?
बाबा गोरखनाथ के मंदिर केवल ईंट-पत्थरों की इमारतें नहीं, बल्कि जाग्रत ऊर्जा के केंद्र (Power Centers) हैं। माना जाता है कि इन मंदिरों में आज भी बाबा अदृश्य रूप में वास करते हैं। यदि आप मानसिक शांति या अपनी सोई हुई आंतरिक शक्ति को जगाना चाहते हैं, तो इन पवित्र स्थानों की यात्रा आपके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है।

नमस्ते! आज हम बात करेंगे भारत और नेपाल के उन चुनिंदा मंदिरों की जहाँ बाबा गोरखनाथ की शक्ति साक्षात महसूस की जाती है। साथ ही, मैं आपको बताऊंगा कि वहां जाने का सही समय और पूजा की सही विधि क्या है।
1. गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
यह नाथ संप्रदाय का सबसे मुख्य केंद्र और बाबा की तपोस्थली है।
- शक्ति और महत्व: यहाँ बाबा गोरखनाथ की ‘अक्षय धुनी’ (Everlasting Fire) जलती रहती है, जिसकी भभूत मात्र से ही असाध्य रोग ठीक होने की मान्यता है। यहाँ का खिचड़ी मेला विश्व प्रसिद्ध है।
- कहाँ है: यह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के हृदय में स्थित है।
- जाने का सही समय: अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सुखद होता है। मकर संक्रांति (जनवरी) पर जाना सबसे शुभ माना जाता है।
2. गोरखा दरबार और गुफा (नेपाल)
नेपाल के इतिहास और अस्तित्व का बाबा गोरखनाथ से गहरा नाता है।
- शक्ति और महत्व: नेपाल के ‘गोरखा’ (Gorkha) समुदाय का नाम बाबा के नाम पर ही पड़ा है। यहाँ एक प्राचीन गुफा है जहाँ बाबा ने वर्षों तपस्या की थी। मान्यता है कि नेपाल के राजपरिवार को बाबा गोरखनाथ ने ही अखंड राज का वरदान दिया था।
- कहाँ है: यह काठमांडू से लगभग 140 किमी दूर गोरखा जिले में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।
- जाने का सही समय: मार्च से जून और सितंबर से नवंबर।
3. गढ़वा घाट और चुनार (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश)
विंध्य पर्वतमाला की गोद में बसा यह क्षेत्र तांत्रिक और योगियों के लिए स्वर्ग के समान है।
- शक्ति और महत्व: यहाँ बाबा गोरखनाथ के प्राचीन चरण चिह्न (Footprints) और गुफाएं हैं। यह स्थान कुंडलिनी जागरण और हठयोग साधना के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। [Internal/External Link Here]
- कहाँ है: वाराणसी के समीप मिर्जापुर जिले में स्थित है।
- जाने का सही समय: मानसून के बाद (सितंबर-अक्टूबर) जब प्रकृति अपने चरम पर होती है।
4. बाबा गोरखनाथ मंदिर, गिरनार (गुजरात)
गिरनार की पहाड़ियाँ सिद्धों की भूमि मानी जाती हैं।
- शक्ति और महत्व: गिरनार की 9,999 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद बाबा गोरखनाथ का शिखर आता है। यहाँ की ऊर्जा इतनी तीव्र है कि साधक को स्वतः ही ध्यान (Meditation) लग जाता है।
- कहाँ है: जूनागढ़, गुजरात।
- जाने का सही समय: सर्दी का मौसम (नवंबर से फरवरी)।
बाबा गोरखनाथ की पूजा विधि (Puja Vidhi)
बाबा गोरखनाथ ‘अघोरी’ और ‘योगी’ दोनों स्वरूपों में पूजे जाते हैं, इसलिए उनकी पूजा सादगी और शुद्धता पर आधारित है:
- शुद्धिकरण: स्नान के बाद स्वच्छ सफेद या भगवा वस्त्र धारण करें।
- आसन: कुशा या ऊनी आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
- धुनी/दीपक: बाबा को अग्नि प्रिय है, इसलिए उनके सामने एक दीपक (घी या तिल के तेल का) जलाएं। यदि संभव हो तो गूगल या लोबान की धूप जलाएं।
- भोग: बाबा को खिचड़ी (चावल और मूंग दाल) का भोग सबसे प्रिय है। इसके अलावा रोट (मोटी मीठी रोटी) का भोग भी लगाया जाता है।
- मंत्र जप: रुद्राक्ष की माला से “ॐ शिव गोरक्ष योगी नमः” का कम से कम 108 बार जाप करें।
- भभूत तिलक: पूजा के अंत में अंगारे की विभूति (भभूत) को अपने माथे पर तिलक स्वरूप लगाएं।
बाबा गोरखनाथ के जीवन के कठोर नियम: वे आदर्श जिन्होंने उन्हें ‘महायोगी’ बनाया
बाबा गोरखनाथ केवल अपनी सिद्धियों के कारण महान नहीं थे, बल्कि उन अटल नियमों (Principles) के कारण महान थे, जिनका उन्होंने अपने पूरे जीवन में पालन किया। उन्होंने सिद्ध किया कि एक साधारण मनुष्य भी यदि अपने मन और शरीर को कड़े अनुशासन में बांध ले, तो वह देवताओं के समान शक्ति प्राप्त कर सकता है।

अब हम बाबा गोरखनाथ के उन ‘सीक्रेट’ नियमों की बात करेंगे जिन्होंने उन्हें ‘नाथों का नाथ’ बनाया। ये नियम आज के दौर में हमारे Self-Improvement और Mental Health के लिए भी उतने ही जरूरी हैं।
1. काया साधना और शारीरिक शुद्धि (Physical Discipline)
बाबा गोरखनाथ का पहला नियम था— “शरीर ही मंदिर है।” उनका मानना था कि कच्चा घड़ा पानी नहीं रोक सकता, वैसे ही कमजोर शरीर ज्ञान को नहीं संभाल सकता।
- हठयोग का पालन: वे प्रतिदिन घंटों कठिन आसनों और प्राणायाम का अभ्यास करते थे। उन्होंने सिखाया कि अपनी सांसों (Prana) पर नियंत्रण पाकर ही हम अपनी आयु और स्वास्थ्य को नियंत्रित कर सकते हैं।
- अल्पाहार (Mitahara): वे बहुत कम और सादा भोजन करते थे। उनका नियम था कि पेट का आधा हिस्सा भोजन से, एक चौथाई पानी से और एक चौथाई हवा के लिए खाली छोड़ना चाहिए।
2. वाक-संयम और मौन (Control over Speech)
बाबा गोरखनाथ का एक प्रसिद्ध सिद्धांत था— “बोलबा कतौ न बोलबा” (बोलना तो बहुत कम बोलना)।
- मौन की शक्ति: वे व्यर्थ की बातों और विवादों से दूर रहते थे। उनका मानना था कि बोलने से ऊर्जा नष्ट होती है।
- सत्य और मधुरता: जब भी वे बोलते थे, उनके शब्द कल्याणकारी होते थे। उन्होंने कभी किसी का अनादर नहीं किया, लेकिन सत्य कहने में वे कभी पीछे नहीं हटे, चाहे सामने कोई राजा ही क्यों न हो।
3. इंद्रिय निग्रह और ब्रह्मचर्य (Sense Control)
बाबा गोरखनाथ की महानता का सबसे बड़ा आधार उनका अखंड ब्रह्मचर्य और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय थी।
- मन की एकाग्रता: उन्होंने सिखाया कि असली ब्रह्मचर्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है। काम, क्रोध, लोभ और मोह को उन्होंने योग की अग्नि में भस्म कर दिया था।
- स्त्री और पुरुष का समान सम्मान: वे वासना से परे थे और हर जीव में केवल ‘शिव’ (Atma) को देखते थे।
4. ‘अलख निरंजन’ का उद्घोष (Focus on Non-Duality)
उनका नियम था कि वे कभी भी ‘साकार’ (मूर्तियां) के पीछे नहीं भागे, बल्कि उन्होंने ‘निर्गुण’ (Formless God) की उपासना की।
- समानता का नियम: बाबा गोरखनाथ के लिए न कोई ऊंचा था न नीचा। उन्होंने राजाओं को भी भिक्षा मांगना सिखाया और गरीबों को योग की दीक्षा दी।
- शून्यता (Sunyata): उनका नियम था कि ध्यान के समय मन को पूरी तरह ‘शून्य’ कर देना चाहिए। जब मन में कोई विचार नहीं होता, तभी सत्य का दर्शन होता है।
5. ‘करनी’ पर जोर, ‘कथनी’ पर नहीं (Action over Words)
बाबा गोरखनाथ किताबी ज्ञान (Theoretical Knowledge) के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं बनता, करके देखने से बनता है।
- अनुभव ही गुरु है: वे अपने शिष्यों को हमेशा ‘प्रयोग’ करने के लिए प्रेरित करते थे।
- सेवा और परोपकार: उनका नियम था कि एक योगी को हमेशा घूमते रहना चाहिए (रमता जोगी) ताकि वह समाज के कष्टों को देख सके और उन्हें दूर कर सके।
6. धूनी और भभूत का नियम
बाबा गोरखनाथ हमेशा अपने पास एक धूनी (Sacred Fire) जलाकर रखते थे।
- वैराग्य का प्रतीक: आग सब कुछ जलाकर राख कर देती है। यह भभूत उन्हें याद दिलाती थी कि यह शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा, इसलिए अहंकार नहीं करना चाहिए।
- सतर्कता: वे कभी भी गहरी नींद में नहीं सोते थे। योगियों की भाषा में इसे ‘योग निद्रा’ कहते हैं, जहाँ शरीर विश्राम करता है लेकिन चेतना जागी रहती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. बाबा गोरखनाथ के गुरु कौन थे?
बाबा गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (Guru Matsyendranath) थे, जिन्हें मछेंदरनाथ भी कहा जाता है।
2. गोरखनाथ जी का मुख्य मंत्र क्या है?
उनका सबसे प्रभावी मंत्र “ॐ शिव गोरक्ष योगी” माना जाता है।
3. क्या बाबा गोरखनाथ भगवान शिव के अवतार हैं?
हाँ, धार्मिक मान्यताओं और नाथ साहित्य के अनुसार उन्हें साक्षात भगवान शिव का ही रूप माना जाता है।
4. गोरखबानी क्या है?
बाबा गोरखनाथ द्वारा कहे गए अनमोल वचनों और कविताओं के संग्रह को ‘गोरखबानी’ कहा जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
बाबा गोरखनाथ एक ऐसी महान आत्मा थे जिन्होंने भारतीय संस्कृति को योग और अनुशासन का उपहार दिया। उन्होंने हमें सिखाया कि असली शक्ति बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है। चाहे आप आध्यात्मिक हों या नहीं, उनके द्वारा बताए गए योग के नियम आपकी जीवनशैली को बेहतर बना सकते हैं।
क्या आप कभी गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर गए हैं या आपने उनकी कोई और चमत्कारिक कथा सुनी है? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं!
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